पुण्यमृदा (भाग-दहावा अंतिमभाग)

पुण्यमृदा (अंतिमभाग)

“गीता…. नहीं वो तो मेरी सिर्फ दोस्त थी। बंबई से आने के बाद मैं उससे हम दोनो के बारे मे ढेर सारी बाते करता था। उसे हम दोनो के बारे में सब पता था और उसीने तो मुझे प्यार का सही मतलब समझाया। मामा जाने के बाद गीताने वो जिसे चाहती थी उससे शादी किई।” अर्णब बोलता बोलता भूतकाळात हरवला. मीराने त्याला हाक मारताच भानवर आला आणि मीराला म्हणाला,

“चलो मीरा चलो…..तुम्हे मेरे साथ आना होगा, अगर इसबार भी मैने तुम्हे अकेला छोडा तो मेरी रुह भी इसबार मेरा साथ छोड जायेगी….मुझे तुम्हारा साथ चाहीए मीरा, मैं तुम्हे इस हालात में छोडकर जी भी नहीं जा सकता।” अर्णबने फार कळकळीने तिला विणवु लागला.

“नाही अर्णब जा …… जा तू इथून…..मी पहिलेची मीरा राहीले नाही आता. माझ्याकडे तुला देण्यासारखं काहीच शिल्लक राहील नाही आता. मी तुझ्या लायकीची आता उरले नाही. ज्याची मला सर्वात जास्त किळस वाटायची तेच मला भोगाव लागलं आणि या सर्वांचं कारण फक्त तुला मानत आले होते आणि आजतोवर फक्त तुला कोसत बसले पण आज कळलं की माझ्या नशिबात जे भोग लिहले होते ते मला भोगावेच लागणार.” मीरा आसवे गाळत अतिशय हताश होऊन बोलतं होती.

अर्णबने मीराच्या तोंडावर हाथ ठेवला, ” ऐसे नही बोलते मीरा, मुझे तुमसे और तुम्हारी रुह के कुछ नही चाहीये, मैं तुम्हे खोकर समज पाया की प्यार क्या होता है। अब दोबारा ये सदमा में सह ना पाउगा।”

या दोघांची कथा ऐकून निसरबेगमच्या डोळ्यातून आपसूक पाणी वाहू लागले. निसारबेगम त्यांची कथा ऐकून जागीच उभी झाली आणि एक एक करत मोठंमोठ्याने टाळी वाजवत त्या दोघांपाशी आली. “वाह बाबू वाह……

“बाजीच: -ऐ-अतफाल है दुनिया मेरे आगे, 

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे”

ऐसा नही की यहा की चौखट लाँगने के बाद पवित्रता खत्म हो जाती है बलकी पवित्रता तब खत्म होती है जब राह चलती औरत पे झुंड में खडे रहकर बडे मजे लेकरं छेडतें है, पवित्रता तब खत्म होती है जब भरी भीड में कोई किसीं औरत को गलत तरिकेसे छुना प्रयास करता है, पवित्रता तब खत्म होती है जब कोई मर्द किसीं औरत को छेडतें, मारते समय हिजडोकी तरह चुपचाप देखते रहता है,  पवित्रता तब खत्म होती है जब कोई औरत को सिर्फ एक मर्द संभोग का एक जरिया समज लेता है, और बाबू पवित्रता तब खत्म होती है जब कोई अपनी घिनोनी नजरोसेही किसीं औरत को निरावृत कर देता है|

ऐसें कई पुरुष है जो जिंदगी मे एक बार भी यहा कदम नही रखते लेकीन अपने मन को वेश्यालय बनाकर कई औरत को सिर्फ एक वेश्या समज लेते है। यहापे चोरीछुपे आनेवाले भी कई लोग हे जो सिर्फ और सिर्फ हवस की प्यास बुझाने आते है और खुद को मर्द समझकर अपनी घिनोनी चाहत पुरी कर निकल जाते हैं।

कोईभी औरत जब एकबार वेश्यालय की चौखट लाँगती है, तब वापस कभी नही जाती लेकीन उन हैवांनो का क्या कहोगे, जो खुद को पवित्र समझकर यहा बार बार आते है और अपनी अशुध्दता और अपवितत्रता बाटते फिरते है।

औरत कल भी पवित्र थी,आज भी पवित्र हैं और आनेवाला कल भी पवित्र ही रहेगी, लेकीन औरत को मिट्टी समझने वाला ये हैवान कब पवित्र होंगा बाबू?….कब पवित्र होगा?

“यहापे जो कोई भी आता हे वो यहासे कुछ कुछ ले जाने के लिये ही आता है सिर्फ हम जैसी वेश्या वो छोडके। लेकीन आज मैने मेरी पुरी जिंदगी मे पहली बार तुम जैसा मर्द देखा जो कई सालो से इन सब हैवांनो के हवस का शिकार बनी अपनी मोहब्बत को यहा से ले जाना चाह रहा है। वाह बाबू वाह……

गलती किससे नही होती लेकीन एक गलती के लिए अपनी पुरी जिंदगी कुर्बान करनेवाला मर्द आज देखा। जा बेटी जा” निसार बेगम मिराचा हाथ अर्णबच्या हातात ठेवतं खाली वाकुन मूठभर माती उचलते आणि त्या दोघांच्या हाताच्या ओंजळीत सोडते.

“सही मायनो में देखा जाये तो आज कहा जाकर इस माटी में इस शफाफ ईश्क के अस्क घुल कर ये मिट्टी पुण्यमाटी हुई है।” अर्णब आणि मीराचे अंतःकरण भरून आलं. मिराचा श्वास फुलून आला आणि मीराने निसारबेगमला एक घट्ट मिठी मारली.

तिथे असलेल्या सर्व वेश्यांना गहिवरून आले आणि त्या उभ्या झाल्या. त्यांनाही अश्रू अनावर झाले आणि त्यांच्या टाळ्यांच्या कडकडाटात संपूर्ण आसमंत नाहून निघाला…….

 #समाप्त


© मंगेश उषाकिरण अंबेकर
● ९८२३९६३७९९

प्रतिक्रिया व्यक्त करा

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदला )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदला )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदला )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदला )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.